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पलामू जिले में दलित समाज की शैक्षिक स्थिति का एक ऐतिहासिक अध्ययन | पलामू में दलित शिक्षा इतिहास | AGPH Books

Weight 0.4 kg
Dimensions 22.86 × 15.24 cm
ISBN Number

9789376405862

Authors:

डॉ० शुक्ला मनोरमा

No. Of Pages

207

Publication Date

16/02/2026

525.00

यह पुस्तक झारखंड के पलामू जिले में दलित समाज की शैक्षिक स्थिति का ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है। इसमें शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, समानता और आत्मसम्मान का माध्यम माना गया है। औपनिवेशिक काल से लेकर स्वतंत्रता के बाद और आधुनिक समय तक की परिस्थितियों का विस्तार से अध्ययन किया गया है। सामाजिक भेदभाव, आर्थिक कठिनाइयों और संस्थागत बाधाओं का विश्लेषण करते हुए सरकारी नीतियों और प्रयासों की समीक्षा की गई है। यह पुस्तक शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और समाजशास्त्र में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत उपयोगी है।

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यह पुस्तक झारखंड के पलामू जिले में दलित समाज की शैक्षिक स्थिति का ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है। इसमें शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, समानता और आत्मसम्मान का माध्यम माना गया है। औपनिवेशिक काल से लेकर स्वतंत्रता के बाद और आधुनिक समय तक की परिस्थितियों का विस्तार से अध्ययन किया गया है। सामाजिक भेदभाव, आर्थिक कठिनाइयों और संस्थागत बाधाओं का विश्लेषण करते हुए सरकारी नीतियों और प्रयासों की समीक्षा की गई है। यह पुस्तक शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और समाजशास्त्र में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत उपयोगी है।

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Book Title : पलामू जिले में दलित समाज की शैक्षिक स्थिति का एक ऐतिहासिक अध्ययन | पलामू में दलित शिक्षा इतिहास | AGPH Books

यह पुस्तक पलामू जिले के सामाजिक इतिहास के एक अत्यंत महत्वपूर्ण, किंतु लंबे समय तक उपेक्षित रहे पक्ष—दलित समाज की शैक्षिक स्थिति का गहन और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है।

शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, आत्मसम्मान और समान अवसरों का आधार है। इसी दृष्टिकोण से यह कृति पलामू क्षेत्र में दलित समुदाय की शिक्षा से जुड़ी ऐतिहासिक परिस्थितियों, चुनौतियों, संघर्षों और उपलब्धियों का व्यवस्थित रूप से अध्ययन करती है।

पलामू, जो वर्तमान में झारखंड राज्य का एक महत्वपूर्ण जिला है, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से लंबे समय तक पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। इस क्षेत्र में दलित समाज ने शिक्षा के क्षेत्र में अनेक बाधाओं का सामना किया—सामाजिक भेदभाव, आर्थिक अभाव, संसाधनों की कमी और शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित पहुँच।

यह पुस्तक इन सभी पहलुओं का ऐतिहासिक क्रम में विश्लेषण करती है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किस प्रकार शिक्षा का विकास सामाजिक संरचना से गहराई से जुड़ा रहा है।

इस अध्ययन की विशेषता यह है कि इसमें औपनिवेशिक काल से लेकर स्वतंत्रता के बाद और समकालीन समय तक की परिस्थितियों को समग्र रूप से जोड़ा गया है।

लेखक ने सरकारी नीतियों, स्थानीय प्रयासों, सामाजिक आंदोलनों और शिक्षा से जुड़े कार्यक्रमों का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया है। साथ ही यह भी दर्शाया गया है कि संवैधानिक प्रावधानों और आरक्षण नीति जैसे कदमों ने दलित समाज के लिए शिक्षा के द्वार किस प्रकार खोले और उनके वास्तविक प्रभाव क्या रहे।

पुस्तक में केवल आँकड़ों का संकलन ही नहीं, बल्कि उनके सामाजिक अर्थ की व्याख्या भी की गई है। विद्यालयों की संख्या, छात्र-छात्राओं की भागीदारी, उच्च शिक्षा में प्रवेश की स्थिति और शिक्षित युवाओं की सामाजिक भूमिका जैसे मुद्दों को विस्तार से समझाया गया है। विशेष रूप से बालिका शिक्षा पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि दलित महिलाओं के लिए शिक्षा का महत्व और भी अधिक रहा है।

यह पुस्तक शोधार्थियों, इतिहासकारों, समाजशास्त्र के विद्यार्थियों तथा नीति-निर्माताओं के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। यह न केवल एक क्षेत्र विशेष का अध्ययन है, बल्कि यह भारत में शिक्षा और सामाजिक न्याय के संबंध को समझने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।

About the Author

डॉ० शुक्ला मनोरमा

डॉ० शुक्ला मनोरमा का जन्म 7 जनवरी 1975 ई० को झारखण्ड राज्य के पलामू जिला के अंतर्गत हिसरा बरवाडीह ग्राम में हुआ। इनके पिता झारखण्ड के चतरा जिला स्थित इटखोरी प्रखण्ड में कृषि विभाग में सहायक कर्मचारी के पद पर कार्यरत थे। पारिवारिक स्थानांतरण के कारण डॉ० शुक्ला मनोरमा की प्रारंभिक एवं माध्यमिक शिक्षा इटखोरी में संपन्न हुई।

पिता के चंदवा प्रखण्ड में स्थानांतरण के पश्चात उन्होंने इंटरमीडिएट तथा स्नातक की शिक्षा जे० जे० कॉलेज चंदवा से पूर्ण की। स्नातक उपरांत वर्ष 1997 में उनका विवाह संपन्न हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उच्च शिक्षा की निरंतरता बाधित हुई।

पारिवारिक उत्तरदायित्वों, विशेष रूप से बच्चों के पालन-पोषण के साथ-साथ उन्होंने शिक्षा एवं अध्यापन को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाए रखा। वर्ष 2005 में उनका चयन एक प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापिका के रूप में हुआ।

पारिवारिक एवं सामाजिक स्थिरता प्राप्त होने के उपरांत उन्होंने पुनः उच्च शिक्षा की दिशा में अपने प्रयास प्रारंभ किए। वर्ष 2011 में डॉ० शुक्ला मनोरमा ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की।

स्नातकोत्तर अध्ययन के दौरान उनकी अकादमिक रुचि सामाजिक इतिहास की ओर विशेष रूप से केंद्रित रही। उनका अध्ययन क्षेत्र विशेष रूप से दलित एवं पिछड़े वर्ग की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, संरचनात्मक असमानताएं तथा ऐतिहासिक प्रक्रियाएं रहा।

अपने शोध कार्य के माध्यम से उन्होंने अपने मूल ग्राम एवं अपने आसपास के क्षेत्रों में निवास करने वाले हाशिए पर स्थित समुदायों के जीवन स्तर, सामाजिक गतिशीलता तथा ऐतिहासिक चेतना का विश्लेषण करने का संकल्प लिया।

तथापि, कुछ अपरिहार्य पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उन्हें ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र में स्थानांतरित होना पड़ा। शहरी जीवन में अध्यापन कार्य के साथ प्रतिदिन लगभग 60 किलोमीटर की दूरी तय करने के कारण शोध कार्य हेतु अपेक्षित समय और संसाधनों का अभाव उत्पन्न हुआ।

निरंतर कार्यभार, दैनिक जीवन के संघर्ष तथा समय की सीमाओं के कारण अंततः शोध कार्य को अस्थायी रूप से स्थगित करना पड़ा। फिर वर्ष 2019 में उन्होंने पुनः अपने शोध कार्य को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया और इसी क्रम में उन्होंने रामचंद्र चंद्रवंशी विश्वविद्यालय में पीएचडी के लिए नामांकन कराया तथा “पलामू जिला में दलित समाज की शैक्षिक स्थिति का एक ऐतिहासिक अध्ययन” विषय पर शोध कार्य प्रारंभ किया।

शोध के दौरान देश में लॉकडाउन भी लगा, परंतु उन्होंने इस आपदा को अवसर में बदला और निरंतर अपने शोध कार्य में लगी रहीं। अपने निरंतर परिश्रम एवं अनुशासित अध्ययन के परिणामस्वरूप उन्होंने वर्ष 2023 में अपना शोध कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण किया और इस उत्कृष्ट शोध के लिए वर्ष 2023 में झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार द्वारा उन्हें पीएचडी की उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया गया। डॉ० शुक्ला मनोरमा का जीवन संघर्ष, समर्पण और निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा का प्रतीक है।

शिक्षा के प्रति उनका लगाव और समाज के वंचित वर्गों के प्रति उनकी संवेदनशीलता उनके लेखन कार्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

About The Publisher:

AGPH Books is a Professional Self Book Publishing House based in Central India, specializing in academic, professional, fiction, and non-fiction books in both print, digital and audio formats. The publishing house produces textbooks, research and reference works, biographies, self-help titles, children’s books, literary fiction, poetry, and general interest publications. With a transparent publishing process and strong digital distribution, AGPH Books ensures global availability through Google Books, Amazon, Flipkart, and its official website store, supporting authors and institutions in reaching a wide and diverse readership.

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